भारत और बुद्ध :
आज दिनांक 7 मई 2020 बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सभी मित्रों को शांति और सद्भावना का सन्देश मानव जाती के उत्थान व अभ्युदय के लिए प्रेरणादायी हो। गौतम बुद्ध राजसी ऐश्वर्य से लुम्बिनी में 563 ई पू जन्म लेकर पले-बढ़े सभी सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन पाया, शिक्षा दीक्षा सम्पन्न हुई, कहीं कोई दुःख कष्ट नहीं था, यौवन की दहलीज पर आते ही अचानक जीवन का असली अर्थ समझ आया और सबकुछ छोड़कर 29 वर्ष की आयु में वन को चल दिए, पूर्णत्व की खोज करने के लिए। ज्ञान और आत्मतत्व से परिपूर्ण मनुष्य ही ऐसा कठोर व्रत ले सकते हैं, परम ज्योति से साक्षात्कार के उपरांत बोध गया में बोधि वृक्ष के नीचे तत्त्व ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान प्राप्तकर अपना पहला उपदेश गंगा किनारे वाराणसी के समीप सारनाथ में पांच ब्राह्मण सन्यासियों के सम्मुख दिया, जिसके बाद उनके विचारों का प्रसार भारतवर्ष ही नहीं अपितु सुदूर दक्षिण पूर्व के देशों तक हुआ।
गौतम बुद्ध तथागत ने अनेक प्रकार से मानवमात्र के दुखों को दूर करने की शिक्षा दी, उन्होंने तीन सिद्धांत दिए :- अनीश्वर वाद - यानि ईश्वर के अस्तित्व का न होना; कोई उत्पतिकर्ता नहीं है और न ही अंत अतः इस सृष्टि का न प्रारम्भ न अंत, दूसरे सिद्धांत में आत्मा पर कहते हैं की आत्मा का ज्ञान महानिर्वाण से ही मिल सकता है जिसे ध्यान व् समाधी से ही प्राप्त किया जा सकता है तथा तीसरा क्षणिकवाद जिसमें इस संसार में सब कुछ क्षणिक व् नश्वर है स्थायी कुछ भी नहीं है। बुद्ध ने मनुष्य को दुखों से मुक्ति पाने के लिए अष्टांग मार्ग का रास्ता सुझाया था जिसमें; १) सम्यक दृष्टि - सत्य में विशवास २. सम्यक संकल्प - नैतिक विकास ३ सम्यक वाक - झूठ न बोलना ४. सम्यक कर्म - दया व् करुणा ५. सम्यक जीविका - हानिकारक व्यापार का निषेध ६. सम्यक प्रयास - अपने में सुधार ७. सम्यक स्मृति - स्पष्ट ज्ञान तथा ८. सम्यक समाधि - निर्वाण प्राप्त करना, इस विधि से मनुष्य अपने दुखों से पार पा सकता है। इन सभी शिक्षाओं का आधार पतंजलि के अष्टांग योग से मिलता जुलता है जिसमें यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान व् सबसे ऊपर समाधि को बताया गया है जिससे निर्वाण अर्थात बुद्धत्व प्राप्त होता है।
बुद्ध के उपदेशों का सार पंचशील के सिद्धांत के रूप में भी जाना जाता है जिसमें अहिंसा, अस्तेय - चोरी न करना, व्यभिचार न करना, प्रत्याहार - प्रतिकूल आहार निषेध व् मद्यपान निषेध आदि पांच बिंदुओं पर अधिक आग्रह किया गया। जातिके सहज व स्वतंत्र अस्तित्व के लिए ये सिद्धांत आज अति आवश्यक हैं जबकि अहिंसा पर बुद्ध के विचार वर्तमान में महात्मा गाँधी जी के अहिंसा के सिद्धांत से कुछ भिन्न थे कि जैसे कोई जीव आपके प्रति हिंसा पर उतारू हो अहिंसा तब तक ही ठीक रहेगी जब तक आपका जीवन सुरक्षित रहे लेकिन आत्मरक्षा में यदि उसकी हत्या भी हो जाये है तो उसे हिंसा नहीं समझा जाये।
आज भगवान बुद्ध की शिक्षाएं बहुत ही प्रासंगिक हैं विश्व में शांति हो यह हम सभी चाहते हैं, विश्व में अनेक राष्ट्र बुद्ध के अनुयायी हैं, चीन, जापान कोरिया , वियतनाम आदि अनेक देश बौद्ध धर्म का अनुसरण करते हुए ही विश्व में अग्रणी बनें हैं तो भारत जहाँ बुद्ध का अवतरण हुआ वह हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार क्यों हो गया यह सोचने का विषय है। हालाँकि भारत अपनी मर्यादा में रहकर विश्व में अपना स्थान सुरक्षित बनाये हुए है।बुद्ध के शांति व शक्ति के प्रयोग हमारे देश ने किए एक बार पंचशील का प्रयोग हुआ तो दो बार बुद्ध मुस्कुराये भी हैं पहला जब 1974 में परमाणु विस्फोट 18 मई को पोखरण में किया गया तथा दूसरी बार 11 मई 1998 को बुद्ध पुनः मुस्कुराये थे, परिणाम स्वरूप विश्व में भारत परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित हुआ। ये भारत के लिए शक्तिवर्धक क्षण थे जिससे विश्व में भारत की पुनः प्रतिष्ठा हुई। बुद्ध का सन्देश बिलकुल साफ है शक्ति ही शांति का मूल मंत्र है। आज हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी का कोरोना संकट पर विजय के लिए विश्व को स्पष्ट सन्देश है की विश्व शांति के लिए बुद्ध के अंहिंसा, शांति, सह अस्तित्व व् विश्व बंधुत्व के मंत्र ही कारगर हैं ।
डॉ. मनोज गौड़।
7 मई, 2020