ज्ञान रूपी वृक्ष की जड़े शिक्षा में हैं , शिक्षा से ही व्यक्ति का निर्माण होता है। शिक्षा जीवन का आधार है, तथा व्यक्ति को वह सब प्राप्त करने की शक्ति देता है जिसे वह अपने स्वप्न में देखता है। शिक्षा, अध्ययन, अध्यात्म, चिंतन, निर्वाण ये सब शिक्षा के ही अंग हैं, अ से शुरू होकर यह यात्रा ओंकार तक पहुँचती है। भारतीय शिक्षा के अलावा किसी अन्य शिक्षा व्यवस्था में यह सिद्धांत नहीं है। वे शिक्षित होकर विकास की ऊंचाइयों को छू सकते हैं लेकिन वास्तविक ज्ञान, जीव-ज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान और सृष्टि-विज्ञान को छू भी नहीं सकते। दुर्भाग्य से आज भारत के अधिकतर मानव अपनी दिव्य और पवित्र ज्ञान वापी को छोड़कर एक छोटे से अंग्रेजी नाम के पोखर से सड़ांध मारती हुई शिक्षा व्यवस्था को ही अपना आदर्श मन चुकी है। और अपने भविष्य को उस अंधकूप में धकेल रही है जहां केवल स्वार्थ है, अलगाव है, एकाकीपन है, अविश्वास है, अंधकार है। जबकि शिक्षा किसी भी मानव को अंधकार से प्रकाश कि ओर ले जाती है।
।। तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्मा अमृतोर्गमय ।।

Bahut badhiya
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